खामोश सी रह के
कुछ ना कह के फिर भी सब कह जाती है
सांझ बुलाके
दिन को छुपा के जिद्दी रात आ जाती है
हर रोज़ है आती मुझे कराती
आभास अकेला होने का
मुझे घेर भी जाती फिर छंट जाती
डर देके सवेरा होने का
मेरी आँखें सो भी ना पाती
कि सुबह आँखें लेती खोल
जागी आंखों की बात दबा दे
झगडालू से दिन का शोर
फिर आवेशित कभी सविनय
वही व्यवहार वही अभीनय
वही थकी सी चर्या मेरी झंझावात पा जाती है
फिर सांझ बुला के दिन को छुपा के जिद्दी रात आ जाती है
हर कोने में इसके होने में
कभी सखी सी भी लगती है
मेरे सच को साँझा करती
इस संग भी जमती है
पर बात बढ़ा के याद दिला के
उठ जाते कितने ही सवाल
जीवन बोझा लगने लग जाता
और बेचारा मैं हमाल
चुप सी निशा यह सवाल उठाके
घुप अँधेरा सब याद दिला के
नींद उड़ा के निशा ये वैरी फिर सुबह में घुल जाती है
फिर सांझ बुला के दिन को छुपा के जिद्दी रात आ जाती है
c&p abhishek bhola 2003
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