कल्पित इच्छा व्याकुल मन में
जन कण वर्षण से छुपी पड़ी
तेरे मोह की धुली कुंठा विछोह है
कर्षण रमण से उड़ चली
हर दर्शन हर बढ़ा बन्धन की
आज अवहेलना कर जाऊंगा
मैं आज उल्लासित हाथ खोले आलिंगन तेरा पाऊँगा
नाम मृत्यु मुझको प्रिय
डरते होंगे बडे बडे
पर व्याकुल मैं तुझको पाने को
जोहूँ बाट अकेला खडे खडे
दोगले जीवन में अपना जीवन विलीन नहीं कर पाऊंगा
मैं आज उल्लासित हाथ खोले आलिंगन तेरा पाऊंगा
जग स्वीकार आचार व्यापार
भौतिकता को बी जिया है
प्रेम कपट नाते व्यवहार
सुरा नाम दे पिया है
चेतन में जिया सो लड़खड़ाया
अबके संभल नहीं पाऊंगा
मैं आज उल्लासित हाथ खोले आलिंगन तेरा पाऊंगा
हर कर्म मर्म का विश्लेषण कर
तुझमें ही सत्व पाया
मृत्यु नहीं है तू जीवन सत्य
सो अपनाने तुझको आया
अब तू न ठुकराना मुझको
लॉट के जा न पाऊंगा
मैं आज उल्लासित हाथ खोले आलिंगन तेरा पाऊंगा
2 comments:
आपकी कविताएं बहुत अच्छे भाव लिए हुए हैं और शब्दों का चयन भी बहुत अच्छा है। भाषा यदि थोडी सी और सरल होती तो शायद पाठक और भी आनंदित होते । हांलाकि मुझे इस भाषा में भी बहुत आनंद आया। आशा है मेरे आग्रह को अन्यथा न लेंगें एवं और अधिक कविताएं पोस्ट करेंगें ।
yaar aap ye dil ko chirne vali kavita kyon likhte ho.... chandrapal
Post a Comment