किसी भीड़ के बीच सरकता सा
खुली तंग गलियों से गुज़रता सा
कभी गम का लिए आगोश मिले
कभी सपनों सी फिरदौस लिए
अन्जान डगर के मुहाने पर कम्बख्त खींच ले आता है
पहला पल क्यों कर के छल पीछे छूटता जाता है
रेत में चुभती बूंदों सा
लम्हा बन दिल में उतरता है
सुख दुःख के हर किस्से को
मन के पन्नों पर लिखता है
पिछले पल से फिर हाथ छुडा के साथ कहाँ ले जाता है
पहला पल क्यों कर के छल पीछे छूटता जाता है
आंखों की खारी बूँदें
बीते धुंधले पल चाहती हैं
गफलत में छूटे हाथ कभी
वहाँ हाथ बढाना चाहती हैं
एक बार तो पहले सा होजा बेकद्र बदलता जाता है
पहला पल क्यों करके छल पीछे छूटता जाता है
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