Tuesday, November 27, 2007

BOL DE

कर्कश नीरस विरह पीडन
चिड़ा चिड़ा उकसाती है
ह्रदय वेदना और संवेदना
अंतस को कसमसाती है
घुटन सिकुड़न से मुक्ती दे दे
दर्शन कपाट तू खोल दे
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे

निढाल बेहाल मेरा धरातल
डाल चंचला उजला उर्वर
फटा फटा ह्रदय का तलपट
हो हरित जो तू ले इसे वर
है यह भी प्रेम सक्षम क्यों
तोले औपचारिक मोल पे
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे

शकुन्त सी चह्कों की लहक से
आसक्ती को जगा दिया
पाषाण सम खडा अडिग था
क्यों तुने पिंघला दिया
भाव दे किया निरीह मुझको
है लुप्त धूल में घोल के
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे

घृणा सम प्रतिक्रिया हो गयी
देख सौदर्य और श्रृंगार
निष्ठुर यम सा चुप हुआ क्यों
तेरे अन्दर व्याभीचार
उडाई खिल्ली भावना की
उपहास भाव से तोड़ के
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे

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