कर्कश नीरस विरह पीडन
चिड़ा चिड़ा उकसाती है
ह्रदय वेदना और संवेदना
अंतस को कसमसाती है
घुटन सिकुड़न से मुक्ती दे दे
दर्शन कपाट तू खोल दे
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे
निढाल बेहाल मेरा धरातल
डाल चंचला उजला उर्वर
फटा फटा ह्रदय का तलपट
हो हरित जो तू ले इसे वर
है यह भी प्रेम सक्षम क्यों
तोले औपचारिक मोल पे
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे
शकुन्त सी चह्कों की लहक से
आसक्ती को जगा दिया
पाषाण सम खडा अडिग था
क्यों तुने पिंघला दिया
भाव दे किया निरीह मुझको
है लुप्त धूल में घोल के
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे
घृणा सम प्रतिक्रिया हो गयी
देख सौदर्य और श्रृंगार
निष्ठुर यम सा चुप हुआ क्यों
तेरे अन्दर व्याभीचार
उडाई खिल्ली भावना की
उपहास भाव से तोड़ के
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे
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