कल्पित इच्छा व्याकुल मन में
जन कण वर्षण से छुपी पड़ी
तेरे मोह की धुली कुंठा विछोह है
कर्षण रमण से उड़ चली
हर दर्शन हर बढ़ा बन्धन की
आज अवहेलना कर जाऊंगा
मैं आज उल्लासित हाथ खोले आलिंगन तेरा पाऊँगा
नाम मृत्यु मुझको प्रिय
डरते होंगे बडे बडे
पर व्याकुल मैं तुझको पाने को
जोहूँ बाट अकेला खडे खडे
दोगले जीवन में अपना जीवन विलीन नहीं कर पाऊंगा
मैं आज उल्लासित हाथ खोले आलिंगन तेरा पाऊंगा
जग स्वीकार आचार व्यापार
भौतिकता को बी जिया है
प्रेम कपट नाते व्यवहार
सुरा नाम दे पिया है
चेतन में जिया सो लड़खड़ाया
अबके संभल नहीं पाऊंगा
मैं आज उल्लासित हाथ खोले आलिंगन तेरा पाऊंगा
हर कर्म मर्म का विश्लेषण कर
तुझमें ही सत्व पाया
मृत्यु नहीं है तू जीवन सत्य
सो अपनाने तुझको आया
अब तू न ठुकराना मुझको
लॉट के जा न पाऊंगा
मैं आज उल्लासित हाथ खोले आलिंगन तेरा पाऊंगा
ekaaki se jab bhi ghut ghut.. saanjha karne apna kuch kuch.. kore prishtho pe mujhse jab. aapaa ukera jaata hai.. kahin hriday koshth mein dabaa koi. geet bilakh kar aata hai..
Tuesday, November 27, 2007
BOL DE
कर्कश नीरस विरह पीडन
चिड़ा चिड़ा उकसाती है
ह्रदय वेदना और संवेदना
अंतस को कसमसाती है
घुटन सिकुड़न से मुक्ती दे दे
दर्शन कपाट तू खोल दे
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे
निढाल बेहाल मेरा धरातल
डाल चंचला उजला उर्वर
फटा फटा ह्रदय का तलपट
हो हरित जो तू ले इसे वर
है यह भी प्रेम सक्षम क्यों
तोले औपचारिक मोल पे
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे
शकुन्त सी चह्कों की लहक से
आसक्ती को जगा दिया
पाषाण सम खडा अडिग था
क्यों तुने पिंघला दिया
भाव दे किया निरीह मुझको
है लुप्त धूल में घोल के
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे
घृणा सम प्रतिक्रिया हो गयी
देख सौदर्य और श्रृंगार
निष्ठुर यम सा चुप हुआ क्यों
तेरे अन्दर व्याभीचार
उडाई खिल्ली भावना की
उपहास भाव से तोड़ के
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे
चिड़ा चिड़ा उकसाती है
ह्रदय वेदना और संवेदना
अंतस को कसमसाती है
घुटन सिकुड़न से मुक्ती दे दे
दर्शन कपाट तू खोल दे
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे
निढाल बेहाल मेरा धरातल
डाल चंचला उजला उर्वर
फटा फटा ह्रदय का तलपट
हो हरित जो तू ले इसे वर
है यह भी प्रेम सक्षम क्यों
तोले औपचारिक मोल पे
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे
शकुन्त सी चह्कों की लहक से
आसक्ती को जगा दिया
पाषाण सम खडा अडिग था
क्यों तुने पिंघला दिया
भाव दे किया निरीह मुझको
है लुप्त धूल में घोल के
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे
घृणा सम प्रतिक्रिया हो गयी
देख सौदर्य और श्रृंगार
निष्ठुर यम सा चुप हुआ क्यों
तेरे अन्दर व्याभीचार
उडाई खिल्ली भावना की
उपहास भाव से तोड़ के
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे
Monday, November 19, 2007
PAL
किसी भीड़ के बीच सरकता सा
खुली तंग गलियों से गुज़रता सा
कभी गम का लिए आगोश मिले
कभी सपनों सी फिरदौस लिए
अन्जान डगर के मुहाने पर कम्बख्त खींच ले आता है
पहला पल क्यों कर के छल पीछे छूटता जाता है
रेत में चुभती बूंदों सा
लम्हा बन दिल में उतरता है
सुख दुःख के हर किस्से को
मन के पन्नों पर लिखता है
पिछले पल से फिर हाथ छुडा के साथ कहाँ ले जाता है
पहला पल क्यों कर के छल पीछे छूटता जाता है
आंखों की खारी बूँदें
बीते धुंधले पल चाहती हैं
गफलत में छूटे हाथ कभी
वहाँ हाथ बढाना चाहती हैं
एक बार तो पहले सा होजा बेकद्र बदलता जाता है
पहला पल क्यों करके छल पीछे छूटता जाता है
खुली तंग गलियों से गुज़रता सा
कभी गम का लिए आगोश मिले
कभी सपनों सी फिरदौस लिए
अन्जान डगर के मुहाने पर कम्बख्त खींच ले आता है
पहला पल क्यों कर के छल पीछे छूटता जाता है
रेत में चुभती बूंदों सा
लम्हा बन दिल में उतरता है
सुख दुःख के हर किस्से को
मन के पन्नों पर लिखता है
पिछले पल से फिर हाथ छुडा के साथ कहाँ ले जाता है
पहला पल क्यों कर के छल पीछे छूटता जाता है
आंखों की खारी बूँदें
बीते धुंधले पल चाहती हैं
गफलत में छूटे हाथ कभी
वहाँ हाथ बढाना चाहती हैं
एक बार तो पहले सा होजा बेकद्र बदलता जाता है
पहला पल क्यों करके छल पीछे छूटता जाता है
Sunday, November 18, 2007
RAAT
खामोश सी रह के
कुछ ना कह के फिर भी सब कह जाती है
सांझ बुलाके
दिन को छुपा के जिद्दी रात आ जाती है
हर रोज़ है आती मुझे कराती
आभास अकेला होने का
मुझे घेर भी जाती फिर छंट जाती
डर देके सवेरा होने का
मेरी आँखें सो भी ना पाती
कि सुबह आँखें लेती खोल
जागी आंखों की बात दबा दे
झगडालू से दिन का शोर
फिर आवेशित कभी सविनय
वही व्यवहार वही अभीनय
वही थकी सी चर्या मेरी झंझावात पा जाती है
फिर सांझ बुला के दिन को छुपा के जिद्दी रात आ जाती है
हर कोने में इसके होने में
कभी सखी सी भी लगती है
मेरे सच को साँझा करती
इस संग भी जमती है
पर बात बढ़ा के याद दिला के
उठ जाते कितने ही सवाल
जीवन बोझा लगने लग जाता
और बेचारा मैं हमाल
चुप सी निशा यह सवाल उठाके
घुप अँधेरा सब याद दिला के
नींद उड़ा के निशा ये वैरी फिर सुबह में घुल जाती है
फिर सांझ बुला के दिन को छुपा के जिद्दी रात आ जाती है
c&p abhishek bhola 2003
कुछ ना कह के फिर भी सब कह जाती है
सांझ बुलाके
दिन को छुपा के जिद्दी रात आ जाती है
हर रोज़ है आती मुझे कराती
आभास अकेला होने का
मुझे घेर भी जाती फिर छंट जाती
डर देके सवेरा होने का
मेरी आँखें सो भी ना पाती
कि सुबह आँखें लेती खोल
जागी आंखों की बात दबा दे
झगडालू से दिन का शोर
फिर आवेशित कभी सविनय
वही व्यवहार वही अभीनय
वही थकी सी चर्या मेरी झंझावात पा जाती है
फिर सांझ बुला के दिन को छुपा के जिद्दी रात आ जाती है
हर कोने में इसके होने में
कभी सखी सी भी लगती है
मेरे सच को साँझा करती
इस संग भी जमती है
पर बात बढ़ा के याद दिला के
उठ जाते कितने ही सवाल
जीवन बोझा लगने लग जाता
और बेचारा मैं हमाल
चुप सी निशा यह सवाल उठाके
घुप अँधेरा सब याद दिला के
नींद उड़ा के निशा ये वैरी फिर सुबह में घुल जाती है
फिर सांझ बुला के दिन को छुपा के जिद्दी रात आ जाती है
c&p abhishek bhola 2003
HINDI
लोगों के बीच संवाद और व्यवहार भाषा से ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बनता है भाषा हमें जोड़ती है .... चाहे वो कोई भी भाषा हो , लेकिन मानव को प्रकृति में आत्मसात कर देने वाली, गद्य या पद्य दोनों में काव्यात्मकता का भाव देने वाली और हर प्रकार से संपूर्ण भाषा हिन्दी ही है...
सैंकडों साल दूसरों के अधीन रहने के कारण आज हमारे गुणसूत्रों में ही पराधीनता बस चुकी है.... फल स्वरूप आज भारत का युवा युवा तो है लेकिन उसमें यौवन नहीं है ... मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने हमें क्लर्क बना दिया है और हमारे देश कि भाषा, साहित्य और सभ्यता लुप्त हो रही है .... साहित्यकार अंग्रेज़ी भाषा में साहित्य लिखना अपना बड़प्पन मानते हैं तो आम नागरिक इस भाषा में बातचीत करना जबकि ये सिद्ध करने कि आवश्यकता नहीं कि इंग्लिश का व्याकरण अधूरा है .... यह सांकेतिक अधिक है ...
सैंकडों साल दूसरों के अधीन रहने के कारण आज हमारे गुणसूत्रों में ही पराधीनता बस चुकी है.... फल स्वरूप आज भारत का युवा युवा तो है लेकिन उसमें यौवन नहीं है ... मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने हमें क्लर्क बना दिया है और हमारे देश कि भाषा, साहित्य और सभ्यता लुप्त हो रही है .... साहित्यकार अंग्रेज़ी भाषा में साहित्य लिखना अपना बड़प्पन मानते हैं तो आम नागरिक इस भाषा में बातचीत करना जबकि ये सिद्ध करने कि आवश्यकता नहीं कि इंग्लिश का व्याकरण अधूरा है .... यह सांकेतिक अधिक है ...
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