Tuesday, November 27, 2007

MRITYU

कल्पित इच्छा व्याकुल मन में
जन कण वर्षण से छुपी पड़ी
तेरे मोह की धुली कुंठा विछोह है
कर्षण रमण से उड़ चली
हर दर्शन हर बढ़ा बन्धन की
आज अवहेलना कर जाऊंगा
मैं आज उल्लासित हाथ खोले आलिंगन तेरा पाऊँगा

नाम मृत्यु मुझको प्रिय
डरते होंगे बडे बडे
पर व्याकुल मैं तुझको पाने को
जोहूँ बाट अकेला खडे खडे
दोगले जीवन में अपना जीवन विलीन नहीं कर पाऊंगा
मैं आज उल्लासित हाथ खोले आलिंगन तेरा पाऊंगा

जग स्वीकार आचार व्यापार
भौतिकता को बी जिया है
प्रेम कपट नाते व्यवहार
सुरा नाम दे पिया है
चेतन में जिया सो लड़खड़ाया
अबके संभल नहीं पाऊंगा
मैं आज उल्लासित हाथ खोले आलिंगन तेरा पाऊंगा

हर कर्म मर्म का विश्लेषण कर
तुझमें ही सत्व पाया
मृत्यु नहीं है तू जीवन सत्य
सो अपनाने तुझको आया
अब तू न ठुकराना मुझको
लॉट के जा न पाऊंगा
मैं आज उल्लासित हाथ खोले आलिंगन तेरा पाऊंगा





BOL DE

कर्कश नीरस विरह पीडन
चिड़ा चिड़ा उकसाती है
ह्रदय वेदना और संवेदना
अंतस को कसमसाती है
घुटन सिकुड़न से मुक्ती दे दे
दर्शन कपाट तू खोल दे
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे

निढाल बेहाल मेरा धरातल
डाल चंचला उजला उर्वर
फटा फटा ह्रदय का तलपट
हो हरित जो तू ले इसे वर
है यह भी प्रेम सक्षम क्यों
तोले औपचारिक मोल पे
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे

शकुन्त सी चह्कों की लहक से
आसक्ती को जगा दिया
पाषाण सम खडा अडिग था
क्यों तुने पिंघला दिया
भाव दे किया निरीह मुझको
है लुप्त धूल में घोल के
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे

घृणा सम प्रतिक्रिया हो गयी
देख सौदर्य और श्रृंगार
निष्ठुर यम सा चुप हुआ क्यों
तेरे अन्दर व्याभीचार
उडाई खिल्ली भावना की
उपहास भाव से तोड़ के
मेरे कर पर धर अधर कुछ कर स्वर कुछ बोल दे

Monday, November 19, 2007

PAL

किसी भीड़ के बीच सरकता सा
खुली तंग गलियों से गुज़रता सा
कभी गम का लिए आगोश मिले
कभी सपनों सी फिरदौस लिए
अन्जान डगर के मुहाने पर कम्बख्त खींच ले आता है
पहला पल क्यों कर के छल पीछे छूटता जाता है

रेत में चुभती बूंदों सा
लम्हा बन दिल में उतरता है
सुख दुःख के हर किस्से को
मन के पन्नों पर लिखता है
पिछले पल से फिर हाथ छुडा के साथ कहाँ ले जाता है
पहला पल क्यों कर के छल पीछे छूटता जाता है

आंखों की खारी बूँदें
बीते धुंधले पल चाहती हैं
गफलत में छूटे हाथ कभी
वहाँ हाथ बढाना चाहती हैं
एक बार तो पहले सा होजा बेकद्र बदलता जाता है
पहला पल क्यों करके छल पीछे छूटता जाता है


Sunday, November 18, 2007

RAAT

खामोश सी रह के
कुछ ना कह के फिर भी सब कह जाती है
सांझ बुलाके
दिन को छुपा के जिद्दी रात आ जाती है

हर रोज़ है आती मुझे कराती
आभास अकेला होने का
मुझे घेर भी जाती फिर छंट जाती
डर देके सवेरा होने का
मेरी आँखें सो भी ना पाती
कि सुबह आँखें लेती खोल
जागी आंखों की बात दबा दे
झगडालू से दिन का शोर
फिर आवेशित कभी सविनय
वही व्यवहार वही अभीनय
वही थकी सी चर्या मेरी झंझावात पा जाती है
फिर सांझ बुला के दिन को छुपा के जिद्दी रात आ जाती है

हर कोने में इसके होने में
कभी सखी सी भी लगती है
मेरे सच को साँझा करती
इस संग भी जमती है
पर बात बढ़ा के याद दिला के
उठ जाते कितने ही सवाल
जीवन बोझा लगने लग जाता
और बेचारा मैं हमाल
चुप सी निशा यह सवाल उठाके
घुप अँधेरा सब याद दिला के
नींद उड़ा के निशा ये वैरी फिर सुबह में घुल जाती है
फिर सांझ बुला के दिन को छुपा के जिद्दी रात आ जाती है




c&p abhishek bhola 2003














HINDI

लोगों के बीच संवाद और व्यवहार भाषा से ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बनता है भाषा हमें जोड़ती है .... चाहे वो कोई भी भाषा हो , लेकिन मानव को प्रकृति में आत्मसात कर देने वाली, गद्य या पद्य दोनों में काव्यात्मकता का भाव देने वाली और हर प्रकार से संपूर्ण भाषा हिन्दी ही है...

सैंकडों साल दूसरों के अधीन रहने के कारण आज हमारे गुणसूत्रों में ही पराधीनता बस चुकी है.... फल स्वरूप आज भारत का युवा युवा तो है लेकिन उसमें यौवन नहीं है ... मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने हमें क्लर्क बना दिया है और हमारे देश कि भाषा, साहित्य और सभ्यता लुप्त हो रही है .... साहित्यकार अंग्रेज़ी भाषा में साहित्य लिखना अपना बड़प्पन मानते हैं तो आम नागरिक इस भाषा में बातचीत करना जबकि ये सिद्ध करने कि आवश्यकता नहीं कि इंग्लिश का व्याकरण अधूरा है .... यह सांकेतिक अधिक है ...